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शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2009

जिंदगी का उलाहना

जिंदगी मुझको उलाहना दे रही है  
कुछ घाव जो पाले थे मैंने अपनों की तरह 
दर्द वो अब देते नहीं बेगानों की तरह  
किस तरह होगी बसर कुछ समझ आता नहीं  
पर जिंदगी का उलाहना भी तो भाता नहीं  
राह के हर पत्ते पर तेरा नाम लिख कर 
स्याह रातों में अक्सर चिल्लाया तेरा नाम लेकर  
आस की भी उम्र अब तो ढल चुकी है  
जिंदगी अब खुद उलाहना बन चुकी है


:)

बुधवार, 9 सितंबर 2009

अब तो रूक के देख लो

अब तो रूक के देख लो फांसला जो तय किया  
किससे तुमने क्या लिया , किसको तुमने क्या दिया 
चले कुछ दूर फिर भी , आज तक जो साथ है 
और साथ चल कर भी आज तक जो दूर हैं 
उस प्यार पर अधिकार था , और वह अहसान था 
फिर भी उसका बदला हमने एक सा ही क्यों दिया  
हैं दुआऐं कुछ साथ तो बददुआ भी कम नहीं  
गिरने और सभंलने का सिलसिला यूँ चलता रहा  
भला जिनका किया वो आज जिक्र तक करते नहीं 
और बुरा होने पर थू थू हर जगह उसने किया  
सूख गया हर सब्ज रिश्ता अब उलाहना भी मिलता नहीं  
एक पत्र इजहार का वक्त पर जो तुमने दिया नहीं




:)

सोमवार, 7 सितंबर 2009

एक दिन

एक दिन सुबह
सूरज नहीं उगा
हम बिस्तरों में कसमसाते हुए
उसके उगने का इन्तजार करने लगे
पर वह नहीं उगा ।
घीरे -घीरे हमारी बैचेनी बढ़ने लगी
अँधेरे आँखों को चुभने लगे
हम भाग कर सड़कों पर आ गये
हजारों की तादाद में लोग भाग रहे थे
चीख रहे थे
सूरज के उगने की प्रार्थना कर रहे थे
उस समय कुछ अन्धे
एक तरफ खडे़ मुस्करा रहे थे
उन्हें मालूम था
गलत राह पर चलते लोगों को सजा देने
सूरज भी गलत राह पर चला गया है
एक दिन आकाश में लगे तारों के पैबन्द
जगह -जगह से उखड़ गये
लाल -पीले मवादी खून की धाराऐं
सड़कों गलियों बाजारों में गिरने लगी
हमने नाक- भौं सिकोड़े
खिड़की दरवाजे बन्द कर लिये
इस समय कुछ इंसानी केकडे़
घरों से बाहर आकर खड़े मुस्करा रहे थे
क्यों कि उन्हें मालूम था
कि बिल्ली के भाग्य से
छीकें टूटते ही रहते हैं
एक दिन हमारे कद अचानक बढ़ने लगे
यहाँ तक कि हम अपने शहर की
सबसे ऊँची इमारत में
झाँक कर देख सकते थे
शायद यह हमारी बरसों पुरानी
झाँकने की आदत का परिणाम था
हम खुश थे झाँकने की सहूलियत पाकर
पर बहुत भीतर कोई एक दु:खी था
जिसे अपने में झाँकने की आदत थी

शनिवार, 29 अगस्त 2009

तुम मेरी क्या हो

मैं आज बेसाख्ता मैं अपने से पूँछ बैठा
कि तुम मेरी क्या हो
मेरा दिल का सकून
मेरी आखों की नींद
मेरी जुबाँ पर हर वक्त तेरा जिक्र
कानों में गूँजती तेरी हँसी
तेरे कदमों की आहट
तेरी किसी बात को याद करके मुस्करा जाना
और फिर निगाहों का दूर कहीं खो जाना
कभी तेरी जहीनयत् पर फख्र
कभी तेरे गुदाज जिस्म की याद
जुदाई के लम्हों का ये इतना लम्बा सफर
दिलो दिमाग पर एक धुन्ध सी छायी है
मेरे जेहन में तू सिर्फ तू समाई है
तूने मेरे दोनों जहाँ आबाद किये हैं
तेरी आखों में जलते उम्मीदों के चिरागों ने
मुझे मंजिल दिखायी है
मेरी हम सफर ही नहीं हम ख्याल भी है तू
मेरे जीने का सबब और मेरा निर्वाण है तू


:)

बुधवार, 26 अगस्त 2009

भीत कपोत


मौन क्लान्त विश्रान्त
तरू ये भीगे - भीगे
लम्बी सड़कों का
दूर कहीं पर खो जाना
तूफानों का दो हाथों के मध्य गुजरना
कदमों का बरबस ही थमना , चलना
फिर थमना
अंगारों को मुठ्ठी में लेना और झुलसना
पीड़ा को स्वर न देना पर बिलखना
ताका करता है
आखों में बैठा
एक भीत कपोत







:)

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

लौट के ना आ जाना



बहुत भीड़ है कहीं भी खो जाना
तुम कहीं लौट के ना आ जाना
मुसाफिर हूँ मुश्किल है कहीं पर रूक जाना
ढूंढोगे जहॉ छोड़ा था तो मुश्किल है पा जाना
तुम कहीं ......................
भूला के कल को मैने आज इतना से है जाना
मैं न याद रख पाऊगा
तुम्हारा मुस्कराना, सकुचाना, खिलखिलाना
तुम कहीं लौट के ना आ जाना
ये दुनिया तूम्हें लाख समझाए
पर कभी दिल की बातों में मत आना
तुम कहीं .............................
कुछ कदम ऐसे ही होते है
जो उठ कर एक बार वापिस नहीं पलटते
तुम मेरी गुजारिश को चूनौती समझना
तुम कहीं लौट के ना आ जाना

:)

रविवार, 23 अगस्त 2009

जाने कैसे लोग



जाने कैसे लोग यहाँ बसते हैं

जलता है जब घर किसीका ,हँसते हैं
समझाते हैं ज़माने की ऊँच नीच हमको
ख़ुद अपनी नियत पर जो नकाब रखतें हैं
खुश हैं अगर आप तो क्यों खुश हैं
रचते हैं कोई साजिश दिल आपका दुखाते हैं
छिपके करते हैं वार,भाग जाते हैं
जुबाँ शेर की जिगर गीद्डों का रखते हैं
जाने कैसे लोग यंहाँ बसते हैं
जलता है जब घर किसीका हँसते हैं



:)

बुधवार, 19 अगस्त 2009

जिंदगी जब ठहराव होती है

जिंदगी जब ठहराव होती है
हर सुबह शाम की बात होती है
बहुत खामोश हो जाता है जब सारा आलम
तब खुद से खुद की बात होती है
युहीं खो जाती हो तुम जब पास हो कर भी
मुझे भी एक गुमशुदा की तलाश होती है
जब भी हो जाता हूँ उदास हँसते हँसते
यारों में तेरी बेवफाई की बात होती है
जब भी आता है सावन पे प्यार मुझको
दिल के हर कोने में बगावत की आवाज होती है
जब भी देखता हूँ फूलों को मुस्कुराते हुए
किताब में रखे एक सूखे हुए फूल की याद आती है
माना की इस जहाँ में है कोई नहीं अपना
मगर फिर भी
हर रोज किसी के आने की आस होती है

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

थके हुए पाँव

बालू रेत पर
थके हुए पाँव का
अक्स भी ऐसा ही उभरता है
थका हुआ ,बोझिल सा
एक समग्र और लक्ष्य भेदी जीवन का
यही तो परिणाम है
एक थकान
वरना बालू की रेत पर
हवा के झोंके से गुजर जाते
और लहरों से अठखेलिया करते

मंगलवार, 4 अगस्त 2009

तेज धूप का सफर

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तेज़ धूप का सफ़र पर्ल संस्थान जोधपुर द्वारा प्रकाशित पुस्तक से साभार

सर्वाधिकार सुरक्षित© लेखक-विपिन बिहारी गोयल


शनिवार, 1 अगस्त 2009

मन बंजारा

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तेज़ धूप का सफ़र पर्ल संस्थान जोधपुर द्वारा प्रकाशित पुस्तक से साभार

सर्वाधिकार सुरक्षित© लेखक-विपिन बिहारी गोयल