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बुधवार, 27 अप्रैल 2011

बहुत अच्छा किया...

हमीं  से सीखा दोड़ना
हमें गिरा दिया 
बहुत अच्छा किया 
शुक्रिया

बंद नहीं होगी 
फिर भी 
ये पाठशाला
कभी कभी ऐसे 
लोगों से भी
पड सकता है पाला

जीते तुम
जश्न मनाओ 
याद कभी करना
किस से सीखी
वर्णमाला


रविवार, 17 अप्रैल 2011

तेज़ धूप का सफ़र

छाँव का सुकून 
मर्ग मरीचिका बन 
छलता रहा 
तेज़  धूप का सफ़र 
चलता रहा 
इस तपिश में 
ये कौनसी कशिश है
क्या सोच कर ये फूल 
बंजर में खिलता रहा 
होंठ कांपे तो थे 
मुझे रोकने को मगर
मुंह से तुम्हारे 
अलविदा निकला




मंगलवार, 3 नवंबर 2009

बन्द दरवाजों का नहीं अफसोस

बन्द दरवाजों का नहीं अफसोस मुझे  
खोल दो खिड़कियाँ की दम धुटता है  
आह तुमने न सुनी तो न सही  
चीखँ पर तो अजनबी भी पलटता है  
राह उनको दिखाता है फिसलन कि  
और हँसता है जब कोई फिसलता है  
वो कह रहा था मुझसे कि बन दरियादिल  
आँख में अपनी उनकों, तिनका भी खटकता है




:)


मंगलवार, 20 अक्टूबर 2009

अपने हिस्से का सूरज

 मैंने तुमसे मुठ्ठी भर प्रकाश माँगा था
और बदले तुम मेरे अन्धेरों पे  
सुहानुभुती मैं दो शब्द बोलने लगे  
अच्छा तो नहीं लगा  
पर फिर भी मैंने कृतज्ञता प्रगट की  
और मैं कर भी क्या सकता था  
तुम्हें अपना समझ के कुछ मागाँ था  
गैरों के आगे भला कैसे हाथ फैलाता 
मेरा फैला हुआ हाथ लौटता  
इससे पहले वहाँ अजनबियों की एक भीड़ लग गयी  
सब अपने हिस्से का सूरज मुझे दे देना चाहते थे  
पर मैंने अपना हाथ खींच लिया  
उनसे किस मुहँ से कुछ लेता  
आज तक तो अपना सब कुछ तुमको देता आया था








सोमवार, 12 अक्टूबर 2009

यत्रांणा से मुक्त कर दो

यत्रांणा से मुक्त कर दो  
रिक्तता मुझको निगल ले  
इससे पहले उस दिशा में 
प्रस्थान कर दो  
व्योम सा व्यापक नहीं हूँ मैं  
ना समुद्र सी गहराई मुझ में  
मैं तो दीर्ध निश्वासों की कड़ी हूँ 
मुझ में अविकल प्राण भर दो  
यंत्राणा से मुक्त कर दो  
अक्षरों की तिक्तता से जल उठा हूँ  
छिन्न संकल्पों को समेटे 
कब से खड़ा हूं 
मौन का सम्मोहन 
हर कोशिका मैं व्याप्त् है 
तुम मन को स्पन्दन से भर दो  
मुझको यंत्राणा से मुक्त कर दो


शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

में ऐसा एक गीत लिखूगां

मेरे जीवन की सांझ ढले  
इससे पहले तुम आ जाना  
मैं एक पूरा गीत लिखुंगा  
जिसमें मेरे कुछ स्वपन अधूरों का  
जिसमें मेरे कुछ गीत अधूरों का 
जिक्र न होगा 
मैं ऐसा एक गीत लिखूगां 
मेरे जीवन की ......... 
जिसमें तुमसे मेरी चाहत का  
तुमको पा लेने की राहत का  
अहसास तुम्हें भी होगा  
में ऐसा एक गीत लिखूगां 
तेरे आने की आहट को  
मैं अपनी व्याकुलता को  
शब्दों में कैसे बाधुगाँ 
मौन अव्यक्त भाव हों जिसमें  
मैं एक ऐसा गीत लिखुगां 
मेरी जीवन की ....... 
जब मैं पूर्ण हो जाऊगाँ  
तब पूर्ण सृजक हो जाऊगाँ  
तुम मेरी परीचायक हो  
वह गीत तुम्हारा परीचायक होगा  
ऐसा मैं एक गीत लिखुगां ..............




:))

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2009

जिंदगी का उलाहना

जिंदगी मुझको उलाहना दे रही है  
कुछ घाव जो पाले थे मैंने अपनों की तरह 
दर्द वो अब देते नहीं बेगानों की तरह  
किस तरह होगी बसर कुछ समझ आता नहीं  
पर जिंदगी का उलाहना भी तो भाता नहीं  
राह के हर पत्ते पर तेरा नाम लिख कर 
स्याह रातों में अक्सर चिल्लाया तेरा नाम लेकर  
आस की भी उम्र अब तो ढल चुकी है  
जिंदगी अब खुद उलाहना बन चुकी है


:)

बुधवार, 23 सितंबर 2009

मैं इसी शहर में हूँ

मुझ से ग्लानि का बोझ सहा ना जाएगा  
तुम मुझे कभी `मसीहा´ मत कहना  
मैं भीड़ में खड़ा होकर चिल्ला लुँगा 
मुझे मंच पर आने को मत कहना  
इस यंत्राणा में भी मैं मुस्करा लेता हूँ 
मुझे कहकहा लगाने को मत कहना  
उनके जज्बातों को ठेस बहुत पहुँचेगी  
मैं इसी शहर में हूँ उनसे मत कहना


सोमवार, 21 सितंबर 2009

क्यों भूल जाऊँ मैं

स्मृति के दंश, पीड़ा ,छटपटाहट
और तुम्हारा खिलखिलाना
काश भूल जाऊँ मैं
अनभिज्ञता, उपहास , ग्लानि बोध
और तुम्हारा मुझसे नज़रें चुराना
काश भूल जाऊँ मैं
दु:स्साहस , आलोचनाएं , आत्म प्रवंचना
और तुम्हारा शर्म से झुका सिर
काश भूल जाऊँ मैं
बस याद रहे
वो शाम का धुँघलका
गाँव की पगडंडी पर
गाय बकरियों के धर लौटते झुँड
उनके खुर से उड़ी घूल के बीच
तुम्हारा मुझसे टकराना
और आँचल के छोर को ,
दाँतों में दबाकर सकुचाना शरमाना
क्यों भूल जाऊँ मैं
स्पर्धाएँ , चुनौतियाँ , जयमाला
और तुम्हारे गर्व से दिपदिपाना
क्यों भूल जाऊँ मैं
ज्ञान , वैभव , सम्मान चारों दिक्
और तुम्हारा सहज समर्पण
क्यों भूल जाऊँ मैं
विरह वेदना, प्यार की अग्नि परीक्षा
और तुम्हारा खरा उतरना
क्यों भूल जाऊँ मैं


शनिवार, 19 सितंबर 2009

छोटी सी बात

छोटी सी बात का अफसाना बना दिया  
अपना था तुम्हारा, बेगाना बना दिया  
अधेंरे में पल रहा था सपनों का भ्रम  
रोशनी ने उनको पागल बना दिया  
उम्र बहुत लम्बी है पर समय बहुत कम  
आकाश को आंकाक्षाओं की सीमा बना दिया  
रूक तो मैं जाता पर मंजिल थी बहुत दूर  
एक हमसफर ने मुझको अपना बना लिया  
शुक्रिया तो दे दो रूखसती से पहले  
एक लम्हें से तुमने जीवन चुरा लिया






:)