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गुरुवार, 17 सितंबर 2009

तेज धूप का सफ़र

छाँव का सकून 
मृग-मरीचिका बन छलता रहा 
तेज धूप का सफ़र यूँ ही चलता रहा 
राहबर भी सभी किनारा कर गए 
कद अपने ही साये का भी घटता रहा 
इस तपिश में कौन सी वो कशिश  है 
क्या सोच कर ये फूल इस बंजर में खिलता रहा 
कदम दो कदम तुम जब भी चले 
होंसला इस सफ़र को तय करने का मिलता रहा 






:))

8 टिप्‍पणियां:

  1. क्या सोच कर ये फूल इस बंजर में खिलता रहा
    वाह ! बहुत खूब

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  2. बहुत ही सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लिखी हुई आपकी ये शानदार रचना काबिले तारीफ है! बहुत बढ़िया लगा!

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  3. "कदम दो कदम तुम जब भी चले
    होंसला इस सफ़र को तय करने का मिलता रहा"

    सफर का आपने बहुत सुन्दर चित्रण किया है।
    बधाई!

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  4. बहुत ही सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति ।

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  5. "छाँव का सकून
    मृग-मरीचिका बन छलता रहा
    तेज धूप का सफ़र यूँ ही चलता रहा "

    इन शब्दों में आपने बड़ी ही गहरी बात कह दी है.

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  6. क्या सोच कर ये फूल इस बंजर में खिलता रहा
    bahut khoob..

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  7. क्या सोच कर ये फूल इस बंजर में खिलता रहा
    कदम दो कदम तुम जब भी चले
    होंसला इस सफ़र को तय करने का मिलता रहा .
    bahut khoob hai ye baaten .

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