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मंगलवार, 25 अगस्त 2009

लौट के ना आ जाना



बहुत भीड़ है कहीं भी खो जाना
तुम कहीं लौट के ना आ जाना
मुसाफिर हूँ मुश्किल है कहीं पर रूक जाना
ढूंढोगे जहॉ छोड़ा था तो मुश्किल है पा जाना
तुम कहीं ......................
भूला के कल को मैने आज इतना से है जाना
मैं न याद रख पाऊगा
तुम्हारा मुस्कराना, सकुचाना, खिलखिलाना
तुम कहीं लौट के ना आ जाना
ये दुनिया तूम्हें लाख समझाए
पर कभी दिल की बातों में मत आना
तुम कहीं .............................
कुछ कदम ऐसे ही होते है
जो उठ कर एक बार वापिस नहीं पलटते
तुम मेरी गुजारिश को चूनौती समझना
तुम कहीं लौट के ना आ जाना

:)

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने! रचना की हर एक शब्द दिल को छू गई और दिल की गहराई के साथ आपने शब्दों में पिरोया है! बहुत खूब!

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  2. विपिन जी यह सच है ---
    कुछ कदम एसे भी होते हैं
    जो उठकर एक बार वापिस नहीं पलटते |
    सही तस्वीर पेश की है |

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  3. dil ki baaton mein aaye bagair man bhi ti nahi maanta hai !! Kambakht !

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  4. Aapne pyar ko ek kathor dharatal par utar diya hai. Par kya kisi ke laut kar aane se dil ko khushi na hogi. Kavi ke hriday mein todi si komlta bhi hoti hai, aur vo bhi aapne is kavita mein vyakt kiya hai. nishay hi ek behatreen kavita.

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  5. बहुत भीड़ है कहीं भी खो जाना
    तुम कहीं लौट के ना आ जाना
    मुसाफिर हूँ मुश्किल है कहीं पर रूक जाना
    ढूंढोगे जहॉ छोड़ा था तो मुश्किल है पा जाना

    रचना तो लाजवाब है पर .....ये लौट कर आने के लिए क्यों मना कर रहे हैं जी ......!!

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