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शनिवार, 29 अगस्त 2009

तुम मेरी क्या हो

मैं आज बेसाख्ता मैं अपने से पूँछ बैठा
कि तुम मेरी क्या हो
मेरा दिल का सकून
मेरी आखों की नींद
मेरी जुबाँ पर हर वक्त तेरा जिक्र
कानों में गूँजती तेरी हँसी
तेरे कदमों की आहट
तेरी किसी बात को याद करके मुस्करा जाना
और फिर निगाहों का दूर कहीं खो जाना
कभी तेरी जहीनयत् पर फख्र
कभी तेरे गुदाज जिस्म की याद
जुदाई के लम्हों का ये इतना लम्बा सफर
दिलो दिमाग पर एक धुन्ध सी छायी है
मेरे जेहन में तू सिर्फ तू समाई है
तूने मेरे दोनों जहाँ आबाद किये हैं
तेरी आखों में जलते उम्मीदों के चिरागों ने
मुझे मंजिल दिखायी है
मेरी हम सफर ही नहीं हम ख्याल भी है तू
मेरे जीने का सबब और मेरा निर्वाण है तू


:)

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लिखी हुई आपके ये शानदार रचना काबिले तारीफ है ! बहुत बढ़िया लगा!

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  2. Ehsaas...yeh ek shabd h jo is kavita ki ek shabd me vyaakhya kar sakta h...
    Mere blog par aa kar tippani karne k liye dhanyavaad... Aage bhi isi prakaar marg darshan avam protsaahan dete rahein....

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  3. aapki kavitaon ko padh kar
    manali ki line yaad aai hai .

    jazbaaton ko beher me kaise bandhen.

    bahut achhi kavitayen . vishesh roop se tum meri kon ho.

    satya ...

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