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बुधवार, 26 अगस्त 2009

भीत कपोत


मौन क्लान्त विश्रान्त
तरू ये भीगे - भीगे
लम्बी सड़कों का
दूर कहीं पर खो जाना
तूफानों का दो हाथों के मध्य गुजरना
कदमों का बरबस ही थमना , चलना
फिर थमना
अंगारों को मुठ्ठी में लेना और झुलसना
पीड़ा को स्वर न देना पर बिलखना
ताका करता है
आखों में बैठा
एक भीत कपोत







:)

8 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी रचना. अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आकर.

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  2. मौन क्लान्त विश्रान्त
    तरू ये भीगे - भीगे
    लम्बी सड़कों का
    दूर कहीं पर खो जाना
    तूफानों का दो हाथों के मध्य गुजरना
    कदमों का बरबस ही थमना , चलना
    फिर थमना
    अंगारों को मुठ्ठी में लेना और झुलसना
    पीड़ा को स्वर न देना पर बिलखना
    ताका करता है
    आखों में बैठा
    एक भीत कपोत


    वाह .......!!

    शानदार अभिव्यक्ति .....!!

    बहुत सुन्दर रचना ....!!!

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  3. अंगारों को मुठ्ठी में लेना और झुलसना
    पीड़ा को स्वर न देना पर बिलखना


    haan! peeda ka koi koi swar nah hota hai//////

    bahut achci rachna

    उत्तर देंहटाएं

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